Musings
Selected poems by Dr R S Tiwari
आज मुझे
यह
ज्ञात हुआ है ,
खुद को
कितने
बार ठगा है ।
उप-चेतन ने
चेतन को
छल ,
अंतर- मन में
तिमिर
भरा है।
कितने ही वादे
खुद से
दोहराए ,
कितने नूतन
हथकंडे
अपनाए ।
हर बार
उतर समंदर में
इतराए,
डूबे ,उतराए ,
ढूंढ न
मोती पाए।
डॉ शिखरेश । 4.1.2025
Δ
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