Musings

Selected poems by Dr R S Tiwari

आलोक प्रवाह

जब

अकथ्य

कथनीय

हो जाता है ,

रिश्तों में तब

ज़हर

घुल

जाता है ,

सहनशीलता

का

क्षितिज

पार कर,

बादल

विक्षोभ

का

फट जाता है |

डॉ शिखरेश | 23.02.2025

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