Musings

Selected poems by Dr R S Tiwari

आलोक प्रवाह :

अक्षर-अक्षर ब्रह्म से अंतर्नाद अनुगुंजित है,
संपूर्ण प्रकृति सतरंगी क्षिति से अनुरंजित है,
भटक कर इंसान ,बन रहा अब कपटी हैवान ,
सुसंगति संग सन्मार्गी मन मेरा सज्जित है l

डॉ. शिखरेश l 11.08.2025

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