Musings

Selected poems by Dr R S Tiwari

नया निमंत्रण ?

स्वार्थ की
जमीन पर,
रखी नींव की
परतों पर,
बना मकान
टिकता नहीं,
बदलती
शर्तों पर l

थामता
है जो
कटी पतंग
की डोर,
उसकी
चाहत का
न कोई
ओर-छोर l

ये कैसा
है प्यार,
कैसी है
चाहत,
करती है
सदा
अंतर्मन
मर्माहत ?

हर दिन
नव-प्रभात संग,
परवान चढ़े
सूरज का पारा,
साँझ ढले तब
होने लग जाता
चाँद बिन ही
उजियारा l

निंदिया जाए
सुदूर,
अंतर मन की पीर
भोर न आने दे,
भूत रुलाए,
भविष्य डराए,
उप-चेतना
चैन न आने दे l

ये
मटमैली चादर,
आर-पार
नहीं देखने दे ,
नई-नई
शर्तों संग
हर रोज़
नया निमंत्रण दे??

डॉ शिखरेश l 11.01.2026

Leave a comment