Musings

Selected poems by Dr R S Tiwari

  • जब इष्ट अरु अभीष्ट में तादात्म्य हो, जीवन यात्रा अधर से अध्यात्म हो , उर भीतर अंकुर शांति का फूटता, स्व से समष्टि का अंतर में अधिपत्य हो | डॉ शिखरेश | 11.1.2025 Read more

  • अविरल अविराम है अनंत चेतना , देती हमें जो जागृति अरु ज्योत्सना , फिर ये विह्वलता अरु बेबसी कैसी ? क्या हुई तेज पुंज की अवमानना ?? डॉ शिखरेश | 12.1.2025 Read more

  • देवत्व भाव जाग जाए, अस्मिता पर आँच न आए, तटस्थ भाव में रमो सदा , अंतर रोशन हो जाए | डॉ शिखरेश तिवारी 14.01.2025 Read more

  • Leads to Hamartia..

    Those were the days , Had we rainbow- rays In life ,love and lullaby, Unknown to ‘good-bye.’ Storms turned the table, Lost all that was lovable, Made the itinerary miserable, Leaving in lurch the incredible . Fragrance of lilly flowers, Echo of rivers and towers, Kindlen’t love and ecstacy, Pervades a kind of lunacy. Faith Read more

  • प्रेम की पराकाष्ठा , है ईश्वरीय आस्था , चलता इससे जीवन, द्वेष से न हो वास्ता | आत्म बल बढ़ाता है, मद -मोह घटाता है , अंधड़ विद्रूपता का स्वतः ही थम जाता है || डॉ शिखरेश | 16.1.2025 Read more

  • कोई किंतु- परंतु नहीं, स्वर्ग यहीं,नरक भी यहीं | कपाट अंतर के खोलो , किए कुकर्मों पर रो लो | करो अगर तुम पश्चाताप, न सताए पाप का ताप | सम-रसता तो स्वीकारो, मोक्ष यहीं,जरा विचारो | डॉ शिखरेश | 17.1.2025 Read more

  • कोई किंतु- परंतु नहीं, स्वर्ग यहीं,नरक भी यहीं | कपाट अंतर के खोलो , किए कुकर्मों पर रो लो | करो अगर तुम पश्चाताप, न सताए पाप का ताप | सम-रसता तो स्वीकारो, मोक्ष यहीं,जरा विचारो | डॉ शिखरेश | 17.1.2025 Read more

  • कोई किंतु- परंतु नहीं, स्वर्ग यहीं,नरक भी यहीं | कपाट अंतर के खोलो , किए कुकर्मों पर रो लो | करो अगर तुम पश्चाताप, न सताए पाप का ताप | सम-रसता तो स्वीकारो, मोक्ष यहीं,जरा विचारो | डॉ शिखरेश | 17.1.2025 Read more

  • Destiny the Counterfoil..

    Destiny dwells in the castle of human deeds , Beyond all castes, colours and creeds . It is a minute observer in a mute mode , Goes on recording the data of the road . We go on paving the path with closed eyes , Unearthing the pearls of choice beyond skies. Being unmindful of Read more

  • संदर्भ तो बहुतेरे हैं , राज अनेकों गहरे हैं, मत पूछ किसने क्या किया? किस्से आधे-अधूरे हैं | वक़्त ने की घेराबंदी, इंसानों ने हदबंदी, गुलशन सूखा बिन पानी, दौड़ लगाई जो अंधी | समझ आया जब व्याकरण , बदल था उनका आचरण, कुसंग ने पैर जमाए , नव – परिभाषित सदाचरण | डॉ शिखरेश Read more